आखिर वह समय आ ही गया जिसका काफी समय से इन्तजार था। सुबह के 6 बज रहे थे, मैं और मेरे दो मित्र रवि प्रकाश और सुशील, नीम करौली बाबा के दर्शन के लिए लखनऊ से वेन्यू कार में निकल पड़े। यात्रा का रोमांच अपनी चरम सीमा पर था, क्योंकि हम सभी इस आध्यात्मिक सफर का भरपूर आनंद लेना चाहते थे और हम तीनों के उत्साह में कोई कमी नहीं थी।
यात्रा की शुरुआत
सुबह की ठंडी हवा और खाली सड़कों ने यात्रा को और भी सुहाना बना दिया। जैसे-जैसे हम लखनऊ से आगे बढ़े, हल्की-हल्की भूख भी महसूस होने लगी। तभी सुशील भाई ने बताया कि वे कुछ स्नैक्स साथ लाए हैं। फिर क्या था, कार में ही गुझिया, नमकीन और अन्य स्वादिष्ट चीजों का आनंद लिया गया। खासकर गुझिया का स्वाद इतना शानदार था कि हर किसी ने उसकी तारीफ की। मध्यम आवाज में गाने सुनते हुए और हसी मजाक करते हुए कब शाहजहांपुर पहुँच गए पता ही नहीं चला, समय लगभग 11 बजे का था जब हम शाहजहांपुर पहुँचे। यहाँ एक ढाबे पर रुककर हमने लंच किया। रोटी, दाल तड़का और आलू दम का स्वाद लाजवाब था, खासकर आलू दम का तीखा और मसालेदार जायका अभी भी यादगार बना हुआ है।

अब आगे की यात्रा के लिए रवि प्रकाश जी ने ड्राइविंग सीट संभाली, और मैं और सुशील आराम से यात्रा का आनंद लेने लगे। हल्द्वानी होते हुए हम काठगोदाम पहुँचे।
काठगोदाम से पहाड़ी सफर की शुरुआत
काठगोदाम के बाद जैसे ही पहाड़ी रास्ते शुरू हुए, माहौल पूरी तरह बदल गया। सड़क के दोनों ओर चीड़ और देवदार के ऊँचे पेड़ मानो हमारा स्वागत कर रहे थे। ठंडी हवा, पहाड़ों की हरियाली और सुरम्य वादियाँ इस यात्रा को और भी खास बना रही थीं।
पदमपुरी– पहाड़ो की गोद में
हम लोग पदमपुरी पहुँचे, जो कि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का गृह जनपद भी है। यहाँ मेरे एक मित्र के होटल निर्माण कार्य प्रगति पर था। हमने वहाँ जाकर देखा कि कैसे मेरे एक मित्र अपने सपने को साकार कर रहे थे। होटल की लोकेशन नदी के किनारे थी, और सामने फैले देवदार व चीड़ के पेड़ इसे और भी आकर्षक बना रहे थे। होटल को देखकर “ओम शांति ओम” फिल्म का प्रसिद्ध डायलॉग याद आ गया –
“अगर किसी चीज को पूरी शिद्दत से चाहो, तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की साजिश करती है।“
हमने कुछ देर वहाँ समय बिताया और पास की नदी में भी घूमने गए। नदी का पानी लगभग 70% सूख चुका था, जिससे हम आराम से नदी के बीचों-बीच जाकर फोटो खिंचवा सकते थे।
रात्रि विश्राम की खोज – पहाड़ों में ठहरने का अनुभव
शाम के 5 बज चुके थे, और अब हमें रात्रि विश्राम के लिए जगह तलाशनी थी। हम मुक्तेश्वर की ओर बढ़े और रास्ते में कई कॉटेज और होम स्टे देखे। सभी जगहों से पहाड़ों और जंगलों का सुंदर दृश्य दिखाई दे रहा था। लेकिन अंत में हमने फैसला किया कि हम वापस पदमपुरी जाकर टीआरसी गेस्ट हाउस में रुकेंगे, जो कभी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा बनवाया गया था।
गेस्ट हाउस के पास ही एक छोटे से ढाबे पर जाकर डिनर किया और अपने कमरे में आ गए। दिनभर की यात्रा के बाद खाना खाते ही जल्द ही नींद आ गई।
सुबह 5 बजे, चिड़ियों की मधुर चहचहाहट ने नींद खोल दी। जैसे ही खिड़की से बाहर देखा, सूरज की सुनहरी किरणें देवदार के पेड़ों पर पड़ रही थीं। यह नजारा एक सपने जैसा था। यही तो मैं चाहता था –
“सुबह जब आँख खुले, तो सामने बस प्रकृति की सुंदरता हो।”
सुबह की पहली किरणें पर्वतों की चोटियों को सुनहरा स्पर्श दे रही थीं। चिड़ियों की चहचहाहट और भंवरों की गूंज से वातावरण संगीतमय हो उठा था। सूरज की लालिमा वृक्षों और लताओं पर अपनी छटा बिखेर रही थी, और कलकल करती नदियां इस प्राकृतिक सौंदर्य में मानो जान डाल रही थीं। हम अपने गेस्टहाउस से निकले और हल्की चहलकदमी करते हुए नदी के किनारे पहुंच गए।

चलते-चलते एक सुंदर कॉटेज-स्टाइल रेस्टोरेंट दिखा, जहां से पहाड़ों की वादियां और नदी का दृश्य मंत्रमुग्ध करने वाला था। हमने तय किया कि यहां रुककर चाय और नाश्ते का आनंद लिया जाए। गर्मागर्म समोसे, चाय और बंद मक्खन का ऑर्डर दिया। जब तक नाश्ता तैयार हुआ, तब तक हम सबने इस मनोरम दृश्य को कैमरे में कैद किया। स्वादिष्ट नाश्ते के बाद, हम अपनी यात्रा के अगले पड़ाव की ओर बढ़े।
भालूगढ़ वाटरफॉल: प्रकृति की गोद में एक अद्भुत अनुभव
हमारी अगली मंजिल थी भालूगढ़ वाटरफॉल, जो पदमपुरी से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर था। टिकट लेकर जैसे ही अंदर प्रवेश किया, प्रकृति का अनोखा सौंदर्य देखने को मिला। चारों ओर हरियाली, पहाड़ी झरने, चहचहाते पक्षी और रास्ते में छोटे-छोटे स्टॉल, जहां स्थानीय लोग पहाड़ी व्यंजन बेच रहे थे—सबकुछ एक स्वप्निल अनुभव सा लग रहा था।
हम झरने के करीब पहुंचे, जहाँ पानी की ठंडी फुहारें तन-मन को ताजगी से भर रही थीं। कुछ लोगों ने लाइफ जैकेट पहन रखी थी, क्योंकि झरने के नीचे पानी की गहराई लगभग 30 फीट से भी अधिक थी। वहाँ का पानी बेहद ठंडा था, लेकिन रोमांच और आनंद से भरा यह अनुभव अविस्मरणीय था। थोड़ी देर वहां रुकने के बाद, हमने पास के एक छोटे से स्टॉल से पहाड़ी फलों का ताजा जूस लिया और फिर आगे बढ़े मुक्तेश्वर धाम की ओर।

मुक्तेश्वर धाम: आध्यात्मिकता और रोमांच का संगम
मुक्तेश्वर धाम समुद्र तल से 7,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। रास्ते में ड्राइविंग की बारी मेरी थी, और यह मेरा पहाड़ों में गाड़ी चलाने का पहला अनुभव था। हालांकि, मैंने अपने मित्रों से यह कह दिया कि मैं पहले भी कई बार पहाड़ों में ड्राइव कर चुका हूँ, ताकि वे निश्चिंत रहें। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ रही थी, रास्ते के ब्लाइंड टर्न और तीखे मोड़ रोमांच को और बढ़ा रहे थे।
मुक्तेश्वर धाम पहुंचकर भोलेनाथ बाबा के दर्शन किए, और वहीं से 200 मीटर की दूरी पर स्थित ” चोली की जोली” भी गए। वहाँ से घाटी का दृश्य अद्भुत था, और हमने जिप-लाइनिंग का भी आनंद लिया। इस ऊँचाई पर पहुँचकर मन एक अलग ही सुकून और शांति का अनुभव कर रहा था। यहाँ की शुद्ध हवा और प्राकृतिक सौंदर्य मन को सकारात्मक ऊर्जा से भर रहा था।

नीम करौली बाबा के दर्शन: दिव्य अनुभूति
मुक्तेश्वर से नीम करौली बाबा के आश्रम की दूरी लगभग 43 किलोमीटर थी। रास्ते में भूख लगने लगी, तो हमने कुमाऊं क्षेत्र में स्थित एक खूबसूरत रेस्टोरेंट में रुककर पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद लिया।
रात 7 बजे तक हम भवाली पहुंचे, जो कि बाबा के आश्रम से करीब 10 किलोमीटर पहले था। हमने तय किया कि यहीं किसी होटल या कॉटेज में रुककर विश्राम करें और अगली सुबह बाबा के दर्शन के लिए निकले।
सुबह होते ही हम जल्दी तैयार होकर मंदिर की ओर बढ़े। बाबा के दर्शन करते समय ऐसा लग रहा था जैसे वे हमें स्नेह से देख रहे हों और कह रहे हों – “बेटा, हमेशा खुश रहो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।” यह अनुभव अविस्मरणीय था और मन को गहरी शांति से भर गया।

नैनीताल की खूबसूरती में खो जाने का मन
दर्शन के बाद हमने सोचा कि जब इतना लंबा सफर तय कर ही लिया है, तो नैनीताल भी घूम लिया जाए। सभी सहमत हुए और गाड़ी नैनीताल की ओर बढ़ चली। रास्ते में पहाड़ों की खूबसूरती के साथ गाने बज रहे थे—
“हुस्न पहाड़ों का क्या कहना, और ये जमीं गा रही है, आसमां गा रहा है…”
नैनीताल पहुँचकर झील के किनारे टहलते हुए हमने इसकी प्राकृतिक सुंदरता को निहारा। कुछ देर नौकायान किया और फिर स्थानीय बाजार में घूमते हुए कुछ भी खरीदारी की।

यात्रा का समापन और लौटने की यादें
अब समय था घर लौटने का। नैनीताल से निकलकर हम धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगे। रास्ते में सहारनपुर के एक हाईवे ढाबे पर रुककर स्वादिष्ट लंच किया। ढाबे के भोजन और उनकी सेवा देखकर यही लगा कि अब ये लोग भी समझ चुके हैं कि ग्राहक को अच्छा अनुभव देना ही उन्हें दोबारा बुला सकता है।
धीरे-धीरे सफर समाप्ति की ओर था। रास्ते भर यात्रा की यादों को ताजा करते हुए हम एक-एक करके अपने घर पहुँच गए। लेकिन दिल अब भी वहीं अटका हुआ था—उन पहाड़ों में, उन झरनों की फुहारों में, उन मंदिरों की भक्ति में, और उन हसीन वादियों में…
निष्कर्ष
यह यात्रा केवल एक ट्रिप नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अनुभव था जिसने प्रकृति, आध्यात्म और रोमांच—तीनों का अद्भुत संतुलन हमारे जीवन में जोड़ा। इस सफर ने न केवल हमारी आत्मा को सुकून दिया, बल्कि हमें यह भी सिखाया कि जीवन में कुछ पल ऐसे ज़रूर निकालने चाहिए जहाँ हम खुद को प्रकृति की गोद में खो सकें।
अगर आप भी उत्तराखंड की इस दिव्य भूमि की यात्रा करने की सोच रहे हैं, तो बिना संकोच निकल पड़िए, क्योंकि यहां हर मोड़ पर एक नया अनुभव आपका इंतजार कर रहा है!
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